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Tuesday, November 22, 2011

जनता की भाषा समझे अर्थशास्त्री तभी कामयाब होंगी नीतियाँ...

आज मै अर्थशास्त्रियों के एक बड़े आयोजन में गया था. समाचार संकलन के लिए. बड़े-बड़े अर्थशास्त्री पहुंचे थे. इन्ही में से एक १३ वी वित्त आयोग के मेम्बर साहब भी पहुंचे थे. विजुअल करने के बाद मै परम्परा के अनुसार बाईट के लिए मुखातिब हुआ. सवाल सीधा था बिहार से जुड़ा हुआ कि आपने central-state-economic relation की बात की है.. कृपया बताये बिहार के ... विकास के लिये बिभाजन के बाद भी सेंट्रल टैक्स के बटवारे(राज्य को वित्तीय मदद) की पुराणी पद्धति सही है... उन्हें दुभाषिये की मदद लेनी पड़ी... चुकी वो हिंदी में तंग थे... मै इंग्लिश में उसी परम्परा का निर्वहन कर रहा था... यहाँ बड़ा सवाल ये है कि हिंदी की जमीं पे हमें हिंदी के लिये सहारे की जरुरत पड़ती है...! वो भी एक इकोनोमिस्ट को जो वित्त आयोग के मेम्बर है...! प्रियवर क्षमा करेंगे . मेरा मकसद किसी भी परिस्थिति में उपहास उडाना नहीं है. सच कहू तो मै इस काबिल भी नहीं... लेकिन समझना होगा देश क़ी ९९.९९% गरीब जनता सिर्फ गरीबी जानती है... तंगी जानती है... वो अपनी समस्या आपको सिर्फ अपनी जुबान में बता सकती है, आधे अधूरे शब्दों के साथ... लेकिन क्या हम तैयार है उसकी भाषा समझने के लिये... या इस बात के लिये भी कि पूरी जनता को पहले इंग्लिश भाषा ही सिखा दी जाए फिर उनकी बात चुकी समझने में आसानी होगी, उनके लिये एक कामयाब निति बनाई जा सकेगी... क्या यही कारण नहीं है कि आज भी ये लोग सिर्फ इन्ही कारणों से विकास से दूर है.? इनके मुताबिक नीतियाँ नहीं बन पाती क्यों कि इनकी भाषा ही लोग नहीं समझते. समझने क़ी कोई कोशिश ही नहीं करता... एक बार फिर से प्रियवर से क्षमा याचना करता हु... माफ़ करेंगे, लेकिन संचार-शोध का छात्र हु तो ये बाते अन्दर तक बैठ जाती है...
Mukesh Kumar Sinha
Ph.D, Journalism & Mass Comm.
Journalist, DD News
report.mukesh1@gmail.com
09308699964